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सम्राट विक्रमादित्य सम्मान
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महाराजा विक्रमादित्यविक्रमादित्य सम्मान
संस्कृति विभाग · मध्यप्रदेश शासन
अमर विरासत

॥ विक्रमार्कस्य वंशे जातः ॥

सम्राटविक्रमादित्य

उज्जयिनी के सम्राट, धर्म के रक्षक, विद्या के संरक्षक जिनका नाम भारत में आदर्श राजत्व का पर्याय बन गया।

उज्जयिनी के सम्राटचक्रवर्तीशकारिनवरत्नों के संरक्षक
महान सम्राट

विक्रमादित्य कौन थे?

सम्राट विक्रमादित्य उज्जयिनी (वर्तमान उज्जैन) के महान चक्रवर्ती सम्राट थे। उनका शासनकाल न्याय, विद्या और संस्कृति का स्वर्ण युग माना जाता है।

उन्होंने शक आक्रमणकारियों को परास्त कर भारतवर्ष को मुक्त कराया और शकारि की उपाधि प्राप्त की। इस ऐतिहासिक विजय के उपलक्ष्य में उन्होंने विक्रम संवत् (57 ईसा पूर्व) की स्थापना की, जो आज भी भारत में प्रचलित है।

उनकी न्याय-प्रियता की कथाएँ पूरे भारत में प्रसिद्ध हैं। वे सामान्य नागरिकों की पुकार सुनने के लिए स्वयं भेष बदलकर जनता के बीच जाते थे। उनका नाम किसी भी न्यायप्रिय और विद्वान शासक के लिए पर्याय बन गया।

सिंहासन बत्तीसी (32 सिंहासन कथाएँ) और बेताल पचीसी जैसे साहित्यिक ग्रंथ उनकी जीवंत विरासत हैं। प्राचीन शिलालेख, ताम्रपत्र और हस्तलिखित पांडुलिपियाँ उनके ऐतिहासिक अस्तित्व के प्रमाण हैं।

मुख्य तथ्य

राजधानीउज्जयिनी (उज्जैन), मध्यप्रदेश
कालखण्डप्रथम शताब्दी ईसा पूर्व (अनुमानित)
विक्रम संवत्57 ईसा पूर्व में स्थापित आज भी प्रचलित
उपाधियाँचक्रवर्ती · शकारि · विक्रमादित्य
दरबारनवरत्न नौ महान विद्वानों का दरबार
साहित्यिक विरासतसिंहासन बत्तीसी एवं बेताल पचीसी
पुरातात्विक प्रमाणसिक्के, ताम्रपत्र, शिलालेख (विक्रम संवत् युग)
आधुनिक शोध संस्थामहाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ, स्थापना 2009
सम्राट के गुण

महानता के अनेक आयाम

विक्रमादित्य केवल विजेता नहीं थे वे न्याय, विज्ञान, कला और मानव कल्याण के एक सम्पूर्ण आदर्श थे।

न्याय एवं धर्म

विक्रमादित्य की न्यायप्रियता की कथाएँ पूरे भारत में प्रसिद्ध हैं। वे भेष बदलकर प्रजा के बीच जाते थे ताकि साधारण नागरिकों को भी निष्पक्ष न्याय मिल सके। उनका सिंहासन (सिंहासन बत्तीसी) धार्मिक शासन का प्रतीक बन गया।

शौर्य एवं पराक्रम

उन्होंने शक आक्रमणकारियों को परास्त कर भारतवर्ष को मुक्त कराया और शकारि की उपाधि प्राप्त की। उनके सैन्य अभियानों ने एक विखण्डित उपमहाद्वीप को धार्मिक शासन के अधीन एकीकृत किया।

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कला एवं विज्ञान का संरक्षण

उनके दरबार में नवरत्न थे जिनमें कालिदास, वराहमिहिर और अमरसिंह शामिल थे। साहित्य, खगोलविज्ञान, आयुर्वेद और व्याकरण की कालजयी रचनाएँ उनके संरक्षण में ही संभव हुईं।

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वैश्विक राजनय

उज्जयिनी के सम्राट के रूप में विक्रमादित्य का प्रभाव दूरस्थ राज्यों तक फैला। उज्जैन प्राचीन विश्व के सर्वाधिक महानगरीय नगरों में से एक बना जहाँ विभिन्न देशों के व्यापारी और विद्वान आते थे।

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दानशीलता एवं जनकल्याण

उनका शासनकाल असाधारण उदारता का काल था धन वितरण, मंदिरों का निर्माण और निर्धनों का उत्थान। उनके 32 दानकार्यों की कथाएँ (सिंहासन बत्तीसी) आज भी भारत भर में प्रसिद्ध हैं।

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खगोलविज्ञान एवं वैदिक ज्ञान

उनके संरक्षण में उज्जैन खगोलीय अनुसंधान का प्रमुख केन्द्र बना। वराहमिहिर की बृहत्संहिता और पंचसिद्धान्तिका जैसी क्रांतिकारी रचनाएँ इसी दरबार में लिखी गईं जो एक सहस्राब्दी तक प्रामाणिक रहीं।

शाश्वत पंचांग

विक्रम संवत्

2083

19 मार्च 2026 से प्रारंभ

शकों पर ऐतिहासिक विजय और भारतवर्ष की मुक्ति के उपलक्ष्य में सम्राट विक्रमादित्य ने एक नया युग घोषित किया विक्रम संवत्। उनकी महान विजय का वर्ष, 57 ईसा पूर्व, इस संवत् का प्रथम वर्ष बना।

आज भारत भर में विक्रम संवत् का उपयोग धार्मिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक अवसरों पर किया जाता है। प्रत्येक हिन्दू पर्व, शुभ मुहूर्त और परंपरागत आयोजन इसी पंचांग के अनुसार मनाया जाता है।

वर्तमान: विक्रम संवत् 2083
नौ रत्न

विक्रमादित्य के नवरत्न

नौ महान विद्वानों, वैज्ञानिकों और कलाकारों का यह दरबार विक्रमादित्य की विद्वत्प्रियता का प्रमाण है। इनके नाम परंपरागत स्रोतों पर आधारित हैं।

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कालिदास

काव्य एवं साहित्य

संस्कृत के महानतम कवि और नाटककार। अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मेघदूत, रघुवंश और कुमारसम्भव जैसी अमर कृतियों के रचयिता।

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धन्वन्तरि

आयुर्वेद एवं चिकित्सा

आयुर्वेद के महान आचार्य। परंपरा के अनुसार विक्रमादित्य के दरबार में इनकी उपस्थिति आयुर्वेदिक ज्ञान की दृष्टि से उल्लेखनीय है।

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वराहमिहिर

खगोल एवं ज्योतिष

उज्जैन के महान खगोलशास्त्री। बृहत्संहिता, पंचसिद्धान्तिका जैसे ग्रंथों के रचयिता। इनकी ऐतिहासिक स्थिति सर्वाधिक प्रमाणित है।

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वररुचि

व्याकरण एवं भाषाविज्ञान

संस्कृत व्याकरण के प्रकाण्ड विद्वान। काव्य एवं साहित्यशास्त्र में असाधारण योगदान।

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शङ्कु

वास्तु एवं स्थापत्य

वास्तुशास्त्र के मर्मज्ञ और विक्रमादित्य युग के प्रमुख वास्तुकार। उज्जैन की भव्य नगर-रचना में योगदान।

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वेताल भट्ट

तंत्र एवं शास्त्र

तंत्रशास्त्र, आध्यात्म और गूढ़विद्या के विशेषज्ञ। नीतिप्रद्यौत के रचयिता।

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घटकर्पर

कला एवं मूर्तिकला

विक्रमादित्य के दरबार के प्रतिष्ठित कवि और मूर्तिकार। इनकी काव्यरचनाएँ संस्कृत साहित्य की अनमोल धरोहर हैं।

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क्षपणक

जैन दर्शन एवं तर्कशास्त्र

जैन दर्शन और न्यायशास्त्र के विद्वान। विक्रमादित्य के सर्वधर्म समन्वय के प्रतीक।

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अमरसिंह

शब्दकोश एवं लेक्सिकोग्राफी

अमरकोश के रचयिता संस्कृत का सबसे प्रसिद्ध और प्राचीन समानार्थी शब्दकोश, जो आज भी अध्ययन किया जाता है।

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* नवरत्नों के नाम पारंपरिक एवं साहित्यिक स्रोतों पर आधारित हैं। वराहमिहिर की ऐतिहासिकता सर्वाधिक प्रमाणित है।

कालक्रम

सहस्राब्दियों की विरासत

लगभग प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व

विक्रमादित्य का उदय

उज्जयिनी (उज्जैन) में सम्राट विक्रमादित्य का राज्याभिषेक। भारतवर्ष में न्याय, विद्या और संस्कृति का स्वर्ण युग आरंभ।

57 ईसा पूर्व

विक्रम संवत् की स्थापना

शकों पर निर्णायक विजय और भारतवर्ष की मुक्ति के उपलक्ष्य में सम्राट ने विक्रम संवत् आरंभ किया। यह पंचांग आज भी सम्पूर्ण भारत में प्रचलित है।

स्वर्ण काल

नवरत्नों का संरक्षण

कालिदास, वराहमिहिर, अमरसिंह सहित नौ महारत्न विक्रमादित्य के दरबार में पल्लवित हुए। उज्जैन विश्व की ज्ञान राजधानी बनी।

चिरकालीन

सिंहासन बत्तीसी की परंपरा

विक्रमादित्य के 32 सोने के सिंहासनों की कथाएँ (सिंहासन बत्तीसी) और बेताल पचीसी भारतीय साहित्य की अनमोल विरासत हैं।

2009

शोधपीठ की स्थापना

महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ की स्थापना मध्यप्रदेश शासन संस्कृति विभाग के अधीन विक्रमादित्य के जीवन और विरासत के व्यवस्थित शोध हेतु।

2026

वैश्विक सम्मान

सम्राट विक्रमादित्य सम्मान के लिए विश्वभर से नामांकन आमंत्रित। विक्रमादित्य के गुणों को आधुनिक युग में जीवंत रखने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं को सम्मानित करने की ऐतिहासिक पहल।

ऐतिहासिक प्रमाण

पाषाण, ताम्र और स्वर्ण में अंकित इतिहास

अनेक पौराणिक शासकों के विपरीत, विक्रमादित्य का अस्तित्व भौतिक साक्ष्यों से प्रमाणित है सिक्के, ताम्रपत्र, शिलालेख और हजारों प्राचीन पांडुलिपियाँ।

01

विक्रम संवत् शिलालेख

राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात में विक्रम संवत् में अंकित पाषाण शिलालेख इस पंचांग की प्राचीनता और प्रामाणिकता की पुष्टि करते हैं।

02

ताम्रपत्र एवं सिक्के

शोधपीठ में "विक्रम" अंकित ताम्र मुद्राएँ (Krid copper coin सहित) संरक्षित हैं। ये भौतिक प्रमाण विक्रमादित्य के ऐतिहासिक अस्तित्व का साक्ष्य देते हैं।

03

प्राचीन हस्तलिखित पांडुलिपियाँ

विक्रमादित्य युग से संबंधित हजारों संस्कृत हस्तलिखित पांडुलिपियाँ सूचीबद्ध की गई हैं जो आयुर्वेद, खगोल, साहित्य और विधि पर आधारित हैं।

शोध संस्थान

महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ

महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ की स्थापना 2009 में मध्यप्रदेश शासन संस्कृति विभाग के अधीन की गई। यह संस्था सम्राट विक्रमादित्य, उनके युग और भारतविद्या (Indology) के व्यवस्थित शोध को समर्पित है।

शोधपीठ शोध-वृत्तियाँ, विचार संगोष्ठियाँ, व्याख्यान, वाद-विवाद और कार्यशालाएँ आयोजित करती है। यह विक्रमार्क और विक्रम संवाद शोध पत्रिकाएँ प्रकाशित करती है तथा वार्षिक विक्रम पंचांग का निर्माण करती है।

प्रतिवर्ष शोधपीठ विक्रमोत्सव का आयोजन उज्जैन में करती है एक भव्य सांस्कृतिक उत्सव जिसमें कलाएँ, प्रस्तुतियाँ, शोध प्रस्तुतियाँ और जन-जागरण शामिल हैं। इसी संस्था के यूट्यूब चैनल भारत विक्रम पर विक्रमादित्य से संबंधित श्रृंखलाएँ प्रसारित होती हैं।

🏛

स्थापना 2009

संस्कृति विभाग, म.प्र. शासन

📖

शोध-वृत्तियाँ

शोध प्रकाशन एवं फेलोशिप

🎭

विक्रमोत्सव

उज्जैन में वार्षिक सांस्कृतिक उत्सव

🏆

सम्मान

अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार कार्यक्रम

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भारत विक्रम

YouTube एनिमेशन श्रृंखला

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पुरातत्व

प्राचीन शिलालेख एवं सिक्के

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